Monday, June 10, 2024

Jean Piaget Theory of Cognitive Development PDF Download

Jean Piaget Theory of Cognitive Development PDF

पियाजे का सिद्धान्त pdf download | Theory of Piaget in hindi pdf

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संज्ञान (Cognition) :-

जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत । Cognitive Deveopment Theory

Concept of Cognitive Development :-

जीन पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास की प्रकिया में मुख्यतः दो बातों को महत्वपूर्ण माना है। पहला संगठन दूसरा अनुकूलन।

सीखना – संगठन और अनुकूलन, आत्मसात्करणसमायोजन, साम्यधारणस्कीमा (Schema)

1. संगठन (Organisation) :- पियाजे के सिद्धांत में संज्ञानात्मक प्रणाली के लिए स्कीमाओं को पुनर्व्यवस्थित करना, उन्हें स्कीमाओं से जोड़ने को संगठन कहा जाता है।

2. अनुकूलन (Adaptation) :- वातावरण के अनुसार अपने आप को ढालना अनुकूलन कहलाता है। इस प्रक्रिया को दो भागों में बांटा गया है।

3. आत्मसात्करण (Assimilation) :- पूर्व ज्ञान को नए ज्ञान जोड़ना आत्मसात्करण कहलाता है।

4. समायोजन (Accommodation) :- पूर्व ज्ञान में परिवर्तन करके वातावरण के साथ तालमेल बिठाना समायोजन कहलाता है।

3. साम्यधारण / संतुलन (Equilibration) :- इसके द्वारा बच्चा आत्मसात्करण और समायोजन की प्रक्रियाओं के बीच संतुलन कायम करता है।

4.स्कीमा (Schema) :– मानव के दिमाग में जो चीज़े पहले से स्टोर होती है वह उनका प्रयोग करके किसी विषय के प्रति एक धारना बनाता है तो इसे स्कीमा कहते है। मानव शिशु में स्कीमा प्रवृत्ति और प्रतिक्रिया जन्म जात होती है।

पियाजे की चार अवस्थाएं कौन कौन सी हैं?

जीन पियाजे (Jean Piaget) के संज्ञानात्मक विकास का सिद्धान्त को 4 अवस्था में बाटा गया है 

संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएँ :-

1.संवेदिक पेशीय अवस्था (Sensory Motor Stage) : जन्म से 2 वर्ष

2. पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (Pre-operational Stage) : 2-7 वर्ष

3. मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Concrete Operational Stage) : 7 से 11वर्ष

4. अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Formal Operational Stage) : 11 से 18 वर्ष

1. संवेदी पेशीय अवस्था (Sensory Motor Stage):- (0 – 2 वर्ष):-

2. पूर्व संक्रियात्मक अवस्था / Pre Operational Stage ( 2-7 वर्ष) : –

इस अवस्था में बालक स्वकेन्द्रित व स्वार्थी न होकर दूसरों के सम्पर्क से ज्ञान अर्जित करता है। वह खेल, अनुकरण, चित्र निर्माण तथा भाषा के माध्यम से वस्तुओं के संबंध में अपनी जानकारी अधिक से अधिक बढ़ाता है। वह धीरे-धीरे प्रतीकों को ग्रहण करने लगता हैं , किन्तु किसी भी कार्य का क्या संबंध होता है तथा तार्किक चिन्तन के प्रति कोई क्रिया नहीं कर पता हैं । इस अवस्था में अनुक्रमणशीलता पायी जाती है। इस अवस्था मे बालक के अनुकरणो मे परिपक्वता आ जाती है

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(i) जीववाद ( Animism):- जब बच्चा सजीव और निर्जीव वस्तुओं में अंतर नहीं कर पाता ठीक है।

(ii) अहंकेंद्रित (Egocentrism ) :- जब बच्चा यह सोचना शुरू कर देता है की जो वह कर रहा है, सोच रहा है, वह सब ठीक है।
(iii) अपलटावी (Irreversibility ) :- इसमें बच्चा वस्तुओ, संख्याओं, समस्या आदि को उलटना पलटना नहीं सीखता ।
Eg – 4 + 6 = 10
6+4= ?

(iv) मुद्रा संप्रत्यय, दूरी, भार, ऊंचाई, क्रम निर्धारण की योग्यता आदि के concept की कमी इसी अवस्था में होती है।

(v) केन्द्रीकरण (centration) :- एक समय में किसी वस्तु की केवल एक विशेषता पर ध्यान दे पाने की प्रवृत्ति को centration कहते है।
(vi) संरक्षण (conservation ):- अगर किसी वस्तु के size या shape में change करदे तो उसकी quantity पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन बच्चा इसको समझ नहीं पाता।
जैसे रोटी बनाने में आटे की गोले को बच्चो को दिखा कर उसका रोटी बनाने के बाद पूछेंगे की आटे को गोला बड़ा है या रोटी तो वह नही बता पायेगा।
(vii) क्रमबद्धता (seriation):- इसमें बच्चा वस्तुओं / तथ्यों को उनके आकार में रखना नहीं सीख पाता है।

3. मूर्त संक्रियात्मक अवस्था / concrete operational stage (7-11 वर्ष ) :-

इस अवस्था में बालक विद्यालय जाना प्रांरभ कर देता है और वस्तुओं एव घटनाओं के बीच समानता, भिन्नता समझने की क्षमता उत्पन हो जाती है इस अवस्था में बालकों में संख्या बोध, वर्गीकरण, क्रमानुसार व्यवस्था किसी भी वस्तु ,व्यक्ति के मध्य पारस्परिक संबंध का ज्ञान हो जाता है। वह तर्क करने लगता है, और वह अपने चारों ओर के पर्यावरण के साथ अनुकूल करने के लिये अनेक नियम को सीख लेता है।

4. औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था (Formal Operational Stage) ( 11-15 वर्ष ) :-

यह अवस्था 12 वर्ष के बाद की है इस अवस्था की विशेषता निम्न है :-

पियाजे के सिद्धांत की आलोचना: –

पियाजे के सिद्धांत की आलोचना : – पियाजे ने मानसिक विकास के चरणों के क्रम को अपरिवर्तनशील बताया है लेकिन अगर बच्चो को अच्छा वातावरण दिया जाये तो वह अपनी अवस्था की क्षमता से अधिक सीख सकता है।

पियाजे का भाषा पर विचार :- विचार पहले आता हैं बाद में भाषा ।

निजवाक् (Ego centrism) :- जब बच्चा कोई काम करते हुए या खेलते हुए जो स्वयं से बातचीत करता है, गुनगुनाते रहता हैं, उसे Ego centrism कहते हैं।

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